रविवार, 5 अक्तूबर 2014

अक्टूबर की रात में अलाव की ऊष्मा का आनंद

हिमांशु द्विवेदी। हिंदी के देश के टॉपटेन अखबारों में से एक हरिभूमि के मैनेजिंग एडिटर। उनसे पहली बार जनवरी 2005 में मिला था। मिला क्या था, बस नमस्ते का आदान-प्रदान हुआ था। वह छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के साथ दैनिक जागरण के दफ्तर में आए थे। मुख्यमंत्री के दफ्तर आने का मैंने जायज फायदा उठाया और उनका इंटरव्यू कर डाला। उसके बाद भी दो बार भेंट हुई। फोन पर बात तो होती ही रहती है। अभी शुक्रवार को उनकी किताब हाथ लग गई। अलाव। यह उनके लिखे संपादकीय आलेखों और उनके द्वारा लिए गए साक्षात्कारों का संकलन है। रूटीन की तरह रात दो बजे घर पहुंचा तो पन्ने पलटने शुरू किए। पढ़ने की शुरुआत की तो पूरा ही पढ़ता चला गया। उनके लेखन से अवगत होने के बाद लगा कि हिमांशु जितने अच्छे इंसान हैं, उतने ही बेहतरीन लेखक और खबरनवीस भी। हालांकि इसमें मुझे कोई आश्चर्यजनक अनुभूति नहीं हुई। क्योंकि मेरा मानना है, जो अच्छा इंसान होगा, वह किसी भी क्षेत्र में हो। अच्छा ही करेगा। अच्छा करना प्रकृति होती है। प्रवृत्ति तो बदली जा सकती है, पर प्रकृति नहीं बदलती। क्योंकि वह तो प्रकृति प्रदत्त होती है। लेकिन अपनी तो प्रवृत्ति ही नहीं बदलती है। जैसे, मौका मिलते ही लोगों की आंख बचाकर होंठों में सुर्ती दबा लेने की और अच्छी किताब मिलते ही पूरा पढ़ डालने की। दशकों से सोच रहा हूं दोनों प्रवृत्तियों को बदल डालने के बार में, लेकिन टीवी पर बार-बार बदल डालो का विज्ञापन देखने के बाद भी नहीं बदल पाया। सो, रात दो बजे से अलाव की आंच से मानसिक ऊष्मा लेने का सिलसिला शुरू हुआ तो सुबह सात बजे तक चलता रहा। नींद का बलिदान तो होना ही था। क्योंकि अच्छी चीज हासिल करने लिए उसका मूल्य तो चुकाना ही पढ़ता है। पहले आलेख में कांची कामकोटि के शंकराचार्य को हत्या के मामले में फंसा कर उन्हें जेल भेजे जाने पर जयललिता की तार्किक लानत मलामत थी। सरल, किंतु तीखी भाषा में। पूरी रवानी के साथ। मैं पढ़ता जा रहा था और सोचता जा रहा था, जयललिता के उस जुल्म को। एकबारगी यह बात जेहन में आ गई कि आज जयललिता भले ही आय से अधिक संपत्ति के मामले में जेल गई हों, पर कहीं न कहीं शंकराचार्य के प्रति किए गए अपराध का प्रतिफल भी ईश्वर उन्हें दे रहा है। उसके बाद कोई भी पन्ना नहीं बचा, जो न पढ़ा हो। विद्याचरण शुक्ल से लेकर श्यामाचरण शुक्ल तक और अजीत जोगी से लेकर चंद्रशेखर साहू तक। प्रमोद महाजन की मौत से जूझने की बात हो नक्सलियों के समर्पण पर हुआँ हुआं करने वालों को जवाब। जब संजय सिंह के इंटरव्यू पर पहुंचा तो एकबारगी अपनी अमेठी के राजपरिवार में मौजूदा दौर में चल रहा संघर्ष दिमाग में कौंध गया। यह इंटरव्यू उस समय लिया गया था, जब संजय सिंह अपने पुत्र की बारात लेकर छत्तीस गढ़ गए थे। आज पिता पुत्र आमने सामने हैं। पुत्र अपनी मां के हक के लिए आवाज उठा रहा है तो वही संजय सिंह अपने समधियाने पर पुत्र को भड़काने का आरोप लगा रहे हैं। उस इंटरव्यू में संजय सिंह ने अपने समधी को राजनीतिक रूप से मजबूत होने की कामना जताई थी। हालांकि संजय सिंह के इंटरव्यू के बाद भी एक इंटरव्यू था। प्रह्लाद पटेल का। मैंने सोचा छोड़ो, अब इसे क्या पढ़ना। फिर याद आया। अरे यह तो वही प्रह्लाद पटेल हैं जिन्हें भाजपा ने सन 89 में टिकट देकर वापस ले लिया था। फिर भी वे मैदान में डटे रहे और जनता दल प्रत्याशी को हराकर सांसद बन गए। दरअसल, उन्हें पार्टी ने चुनाव निशान आवंटित कर दिया था। बाद में जनता दल से समझौते के तहत पटेल से मैदान से हट जाने के लिए कहा, पटेल नहीं माने। लड़े और जीते। पटेल की छवि मेरे मन में नायक की थी। सो, उनके बारे में पढ़ने का मोह कैसे छोड़ता। पढ़ लिया। उसके बाद एक तेज तरार्र मुंहफट सांसद से बात थी। वह भी पढ़ ली। अब किताब खत्म हो चुकी थी। लेकिन अभी साढ़े छह ही बज रहे थे। सात बजे उठता हूं। अब आधे घंटे क्या सोना? फिर भीतर के कवर पेज पर छपा लेखक का परिचय पढ़ लिया। उसके बाद फिर से शुरुआत की। वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव और विश्वनाथ सचदेव की लिखी प्रस्तावनात्मक टिप्पणियों को पढ़ा। हिमांशु द्विवेदी की अपनी बात पढ़ी। जब कुछ नहीं बचा तो उठकर किचन में चला गया। बच्चों के लिए नाश्ता तैयार करने।